उत्तराखंड में कालू सैय्यद बाबा, लोक संतों, सूफियों, फ़क़ीरों की मौजूदगी और कथित मजार जिहाद की एक पड़ताल

उत्तराखंड में कालू सैय्यद बाबा, लोक संतों, सूफियों, फ़क़ीरों की मौजूदगी और कथित मजार जिहाद की एक पड़ताल

इस्लाम हुसैन

उत्तराखंड के कई स्थानों गांवों शहरों जंगलों में कालू सैय्यद बाबा के नाम पर मजार/स्थान/आस्ताने और चौकियां हैं इनका ज़िक अनेक ऐतिहासिक संदर्भ में दर्ज है, राहुल सांकृत्यायन की कुमाऊं के इतिहास में भी इसका उल्लेख है। कालू सैय्यद बाबा को किसी एक सदी या काल में बाँधना मुश्किल है। ज़्यादातर स्रोतों में उनको मुस्लिम फ़क़ीर / सैय्यद सूफ़ी / साईं बाबा/ कहा गया है जो रास्तों के जानकार और पथप्रदर्शक जंगलों के संरक्षक और पीर बाबा के रूप में जाना जाता है।

कालू सय्यद को मुस्लिम सूफी परम्परा में हज़रत सय्यद कमालुद्दीन शाह/बाबा कहा जाता और उनका सम्बन्ध सूफियों के चिश्ती सिलसिले से जोड़ा जाता है। जिनके हिन्दुस्तान में सबके बड़े वली/पीर अजमेर के हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती हैं।

ऐसा माना जाता है कि भारत में मुसलमानों का प्रभाव सूफियों के भारत आगमन से बढ़ा। उत्तर भारत में सूफियों की परम्परा जिन सूफियों की वजह से आगे बढ़ी उनमें अजमेर के ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती प्रमुख हैं, जिनके सालाना उर्स में भारत के प्रधानमंत्री की तरफ से भी चादरपोशी होती है। चिश्ती सिलसिले के सूफी सय्यद होने के नाते उन्हे पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ की नस्ल से जुड़ा माना जाता है।

उत्तराखंड/हिमालय में आने वाले सूफी और पीर बाबा भी उसी कड़ी में हैं। ऐसा माना जाता है कि हज़रत ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती के शिष्य, शागिर्द/खलीफ़ा हज़रत बख्तियार काकी और उनके शिष्य हज़रत बाबा फरीद़ उनके शिष्य/ख़लीफा हज़रत अलाउद्दीन मख़्दूम साबिर पाक (कलियर, रूड़की) और हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली की के दौर (12वीं-14वीं सदी) में उनकी शिष्य परम्परा के बहुत से सूफी पूरे हिंदुस्तान में फैले।

दिल्ली से उत्तर भारत और हिमालय की तरफ आने वाले सूफियों के काफिले जहां जहां क़याम(विश्राम अस्थाई निवास) करते थे वहां वहां इनके निशानात हैं। उनमें एक प्रसिद्ध जगह मुरादाबाद के हसनपुर भी है जहां अभी भी सूफियों के निशानात और मज़ारें हैं।

सूफियों की रवायतों के मुताबिक एक बार 40 सूफियों का जत्था अज़मेर दिल्ली (और कलियर रूड़की) की सूफी दरगाहों से होकर हिमालय की तरफ आया उनमें हज़रत सय्यद कमालुद्दीन बाबा उर्फ कालू सय्यद बाबा भी थे।

हालांकि “कालू” नाम लोक परंपरा में श्याम वर्ण, वनवासी या तपस्वी की तरह इस्तेमाल होता है।
हिमालय/उत्तराखंड कालू सय्यद बाबा के नाम से बैठकें, चौकी, मुकाम और स्थान (थान) उत्तराखंड के बहुत से इलाकों में जंगलों, दर्रों, नदियों और व्यापारिक रास्तों में पाए जाते हैं। कालू सय्यद बाबा के अलावा और भी पीर बाबा, मलंग, बाबा, कलंदर मदारी/जोगी बाबा की बैठकें चौकियां स्थान (थान) जगह भी जंगल के मुहानों (जो कभी व्यापारिक मार्ग में रहे होंगे) पर मिलते हैं।

यह सिलसिला दिल्ली सल्तनत और बाद में मुग़लों के दौर में चला और फ़क़ीर, सूफ़ी और सैय्यद साईं तराई–भाबर के रास्ते कुमाऊँ में पहुँचे जिन्हें जंगलों और व्यापारिक मार्गों के रक्षक माना गया। इन मार्गोंके मार्फत तिब्बत से नमक, बोरैक्स(सुहागा) ऊन, जड़ी-बूटी, लकड़ी आती थी और तराई से पहाड़ को ज़रूरी चीज़ें जाती थीं। यह बाबा पीर रास्तों की सुरक्षा और नैतिक नियंत्रण का प्रतीक बन गए, कोटद्वार के जंगलों से लेकर रानीखेत अल्मोड़ा तक के इलाकों में इनकी मौजूदगी है।

राहुल सांकृत्यायन ने “कुमाऊँ का इतिहास” और अपनी यात्राओं के विवरण में साफ़ लिखा है कि: कुमाऊँ में कई मुस्लिम फ़कीरों और पीरों की क़ब्रें हैं, जिन्हें स्थानीय हिंदू समाज भी सिद्ध पुरुष मानता है। जंगल काटने, रास्ता बनाने, नई बस्ती बसाने, कोई नया काम करने या उत्सव त्योहार से पहले इन पीरों को याद किया जाता था। और इनके स्थानों मजारों चौकियों थानों पर भेंट चढ़ाई जाती है। हिन्दू समुदाय मंगलवार को और मुस्लिम समुदाय जुमेरात (वृहस्पतिवार) ओ भेंट नजराना पेश करता है।

नैनीताल ज़िले के (हल्द्वानी–लालकुआँ–कालाढूँगी क्षेत्र) उधम सिंह नगर (तराई–भाबर) रानीखेत अल्मोड़ा और पिथौरागढ़ के जंगल क्षेत्र रामनगर–कॉर्बेट बेल्ट के पुराने रास्तों कई जगहों पर बहुत सी जगह पर बाकायदा कच्ची/पक्की मज़ार/कब्रें हैं, तो कुछ स्थानों पर बैठकी का पत्थर किसी पेड़ के नीचे आसन/चबूतरा है जिसे सिर्फ़ “बाबा का थान” कहा जाता है। इन्हीं जगहों पर बाद में पक्की मज़ारें या मजहबी प्रतीकों की छोटी-छोटी इमारतें बना ली गईं।

यह स्थान जो इस्लामी सूफ़ी और स्थानीय वन-देवता परंपरा के मेल के उदाहरण हैं। उत्तराखंड में यह स्थान इस्लामी उपस्थिति का गैर-राजनीतिक इतिहास के सबूत हैं और सूफ़ी-इस्लाम और पहाड़ी लोकधर्म के संमिश्रण का उदाहरण हैं। लोक-विश्वास और परंपरा में आज भी कई जगह हिंदू–मुस्लिम दोनों चादर चढ़ाते हैं लोक उत्सवों त्योहारों से पहले बाबा को याद किया जाता है लकड़ी काटने या नई ज़मीन जोतने पर “बाबा नाराज़ न हों” की भावना रहती है
यह परंपरा बताती है कि कालू सैय्यद बाबा धार्मिक प्रचारक नहीं, बल्कि लोक-संरक्षक थे।

यह साबित होता कि मुसलमानों का यहां आना “शासन” के साथ नहीं, बल्कि यात्रा, सेवा और व्यापारिक रास्तों के संरक्षक के तौर पर था। राहुल सांकृत्यायन के अनुसार “जो लोग पहाड़ों के पुराने रास्तों को जानते हैं, वे जानते हैं कि इन मार्गों पर साधुओं, फ़कीरों और बनवासियों का प्रभाव किसी राजा से कम नहीं था। इन फ़कीरों की क़ब्रें आज भी उन रास्तों की पहचान हैं।”

मुस्लिम पीरों को स्थानीय देवता की तरह स्वीकार करने की परम्परा भी देखी गई है यही बिंदु कालू सैय्यद बाबा (अन्य बाबाओं) को समझने की यही कुंजी है। आश्चर्यजनक रूप से गढ़वाली सैद्धाली जागर में भी कालू पीर और अन्य पीरों का गायन किया जाता है।

राहुल सांकृत्यायन की किताब के अनुसार, “कुमाऊँ में कुछ मुसलमान पीर ऐसे भी हुए जिन्हें लोगों ने देवताओं की भाँति मान लिया। उनके नाम पर थान बने, और उनके आगे सभी समुदायो की महिलाएं मन्नत माँगने जाती थीं।” सबसे महत्वपूर्ण बात यह है,कि “कुमाऊँ का इतिहास केवल चंद राजवंशों का इतिहास नहीं है। इसमें वे गुमनाम फ़कीर भी शामिल हैं जिन्होंने बिना तलवार उठाए इस समाज को आकार दिया।”

सीधे सादे शब्दों में हिन्दुस्तान में हज़ारों हजार सूफ़ी हुए लेकिन “बाबा” वही कहलाए जिन्हें सभी समुदायों के आम लोग महिलाएं वनवासी, किसान बागबान रेवड़ वाले, पशुपालक और मुसाफिर/यात्री अपना समझें, इस अर्थ में सैय्यद बाबा छोटे नहीं, बल्कि लोक-सूफ़ी परंपरा की रीढ़ हैं। कालू सैय्यद बाबा उन्हीं में से एक प्रमुख नाम हैं।

मुस्लिम धर्म संस्कृति का उत्तराखंड में एक और आश्चर्यजनक प्रभाव गढ़वाल में दिखता है। भारत में सूफियों ने शोषण रहित बराबरी का समाज बनाने के लिए इंसानियत और भाईचारे को फैलाया। 7वीं सदी से सूफियों ने मध्य एशिया की तरफ से और समुद्री रास्तों से दक्षिण एशियाई देशों में आना शुरू कर दिया था।

तेरहवीं सदी के शुरुआती दौर में चिश्ती सिलसिले के सूफी और बाबा फरीद के अनुयायियों ने पंजाब सहित उत्तर भारत में प्रभाव बढ़ गया था। बाबा फरीद के गुरु/पीर हज़रत बख्तियार काकी बाबा और उनके गुरु ख़्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती जो लंगर अजमेर और महरौली में चलाते थे।

वहीं एक साथ बराबर बैठ कर और एक ही प्लेट रकाबी में खाने की परम्परा बाबाबा फरीद और उनके शिष्यों साबिर पाक ने कलियर रूड़की में और निज़ामुद्दीन औलिया ने दिल्ली में शुरू की परम्परागत भारतीय समाज में यह एकदम क्रान्तिकारी काम था, जिससे समाज के निचले पायदान में रहने वाली जातियों के लोग सूफियों से बहुत प्रभावित हुए। यहीं से लंगर और सामूहिक भोज की परम्परा शुरू हुई जिसे सिखों ने खासकर गुरु अर्जुन देव जी ने और व्यवस्थित रूप दिया।

ऐसा माना जाता है कि साबिर पाक के दौर में आए सूफियों ने हिमालय के अंदरूनी इलाकों में जड़ी बूटियों से इलाज के अलावा दम दरूद (फूंक और मंत्र) से यह इलाज किया एक लम्बा वक्त बीतने पर हिमाचल की दलित जातियों में इसी “दम दरूद”(इसे मंत्र/फूंक आह्वान कै तौर पर समझा जा सकता है) का इलाज जागर के रूप में बदला।

प्रसिद्ध लोकगायक केशव अनुरागी ने ने सूफी सय्यदों बाबाओं के जुड़े मंत्र और प्रतीकों को ढोल और जागर के ज़रिए जागर को प्रचारित किया। इतिहासकार प्रोफेसर विजय बहुगुणा ने इस विषय पर काम किया है।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक नवीन जोशी के संस्मरणों की श्रृंखला ‘ये चिराग जल रहे हैं’ में ‘ढोल सागर ‘ के जानकार और लोक कलाकार केशव अनुरागी की “सैदली जागर” का ज़िक्र किया है, प्रोफेसर विजय बहुगुणा ने अपनी सम्पादित किताब “उत्तराखंड का जन इतिहास लोक संस्कृति एवं समाज का इतिहास” में अपने शोध-पत्र “मध्य हिमालय की मौखिक परम्परा सैद जागर में परिलक्षित दलित चेतना: एक नृ-एतिहासिक अध्ययन” में इसपर विस्तार से प्रकाश डाला है। हालांकि उन्होंने सैद (मुस्लिम सय्यद) को मृत मुस्लिमों की आत्माओं को कहा है। (जो कि मुस्लिम दृष्टिकोण से गलत नज़रिया है) हो सकता है कि सूफियों की अदम (गैर) मौजूदगी में दूसरे लोगों द्वारा मान लिया गया हो।

पहाड़ में किसी परेशानी दुख या रूहानी बीमारी वगैरह में जागर लगातार देवता का आह्वान किया जाता जो आदिवासी समाज में आमतौर पर देखा गया मैं। पहाड़ में यह देवता का जागर लगाने वाले सैद्धाली गाकर यह आह्वान करते हैं प्रो बहुगुणा के अनुसार सैद्धाली मंत्र साबरी ग्रंथों (साबिर पाक कलियर रूड़की से संबंधित) में होते हैं। पहले यह काम दलित जागरिये करते थे अब अन्य जाति के लोगों ने इसमें दिलचस्पी दिखाई है(प्रो बहुगुणा का उपरोक्त लेख पेज 152-153)

उत्तराखंड की सैद्धारी जागर में जगरिए जो सैद्धाली जागर गाते हैं उसमें अधिकतर मुस्लिम प्रतीक और धर्म संस्कृति इतिहास से शब्द है, जैसे यह सैदली जागर शब्द सय्यद से बना है। मुसलमानों की सैय्यद नस्ल (पैगम्बर मुहम्मद साहब के वंशज) से जुड़ा जो सय्यद/सय्यदी से गढ़वाली में सैद्धाली हो गया इस सैद्धाली जागर में मुस्लिम प्रतीक का गायन शामिल हैं, मैमन्दा पीर मुहम्मद से बना है। जागर में बीबी फातिमा का नाम आता है जो पैगम्बर की बेटी हज़रत फ़ातिमा हैं। इसी तरह इस जागर में, ‘कुरान की पोथी को करूं सलाम’ पद हैं।

सल्लाम वाले कुम
त्यारा वे गौड़ गाजिना, सल्लाम वाले कुम
म्यारा मियां रतना गाज़ी, सल्लाम वाले कुम
तेरी वो बीवी फातिमा, सल्लाम वाले कुम
इस जागर को लोक कलाकार केशव अनुरागी ने 80 के दशक में आकाशवाणी में गाया था।

कश्मीर में प्रवेश करने वाले अगले प्रमुख सूफी चौदहवीं शताब्दी के ईरानी कुबरावी संत मीर सैयद अली हमदानी थे, जिन्हें शाह-ए-हमदान के नाम से जाना जाता है। वे एक विख्यात विद्वान थे, जो अपने 700 शिष्यों के साथ कश्मीर आए थे। जिनकी शिष्य परम्परा कश्मीर से चम्बा, कांगड़ा, नूरपूर और सिरमौर गढ़वाल कुमाऊं और नेपाल तक के हिमालयी इलाकों में फैली हुई है। काठमांडू नेपाल की तकिया मस्जिद और कश्मीरी व्यापारियों की बसावट का इतिहास पांच सौ साल से ज़्यादा पुराना है।

एक दिलचस्प बात यह से कि जहां चिश्ती सिलसिले के सूफियों ने हिमाचल के इलाकों में अपनी आवाजाही और गर्दिश की वहीं गुरू गोरखनाथ की परम्परा के कनफटे जोगियों और औघड़ जोगियों (जिनके कान फटे नहीं होते थे) ने भी लम्बी लम्बी यात्राएं करके हिमालय की जनता को प्रभावित किया।

बाद में इनमें कबीर पंथी जोगी भी शामिल हो गए। जिसके निशानात मठों मंदिरों और थानों के रूप में जगह जगह पाए जाते हैं। राहुल जी इन पीरों और बाबाओं को “मध्यकालीन सीमा समाज” (Frontier Society) का हिस्सा मानते हैं— जहाँ धर्म से ज़्यादा लोक-विश्वास और व्यवहारिक नैतिकता मायने रखती थी।

उत्तराखंड से गुरू गोरखनाथ और गोरखपंथी साधुओं का सीधा नाता रहा है। उत्तराखंड में बहुत से गोरखपंथी जगरिए गुरु गोरखवाणी का गायन करते हैं। गोरखपीठ के अधिष्ठाता योगी आदित्यनाथ (मूल नाम अजय सिंह बिष्ट) और उनके गुरु महन्त अवैद्यनाथ (मूल नाम कृपाल सिंह बिष्ट) उत्तराखंड के हैं।

गुरु गोरखनाथ कहते हैं-
हिन्दू ध्यावे देवरा, मूसलमान मसीत
जोगी ध्यावे परम् पद,जंहा देहरा न मसीत
हिन्दू आखै राम को, मुसलमान खोदाई
जोगी ध्यावे अलख को, तँह राम न खोदाई

गोरखपंथियो के अनुसार उनके गुरु गोरखनाथ ने धर्म के कुरीतियों जैसे वर्णाश्रम, साकार उपासना, यज्ञोपवीत, जातीय व्यवस्था, अन्धविश्वस के विरुद्ध अलख जगाई थी। गोरख नाथ साकार ईश्वर को छोड़कर निराकार ईश्वर की आराधना करने को कहते थे । वे कहते थे की साकार उपासना अन्धविश्वसी है।

एकेश्वर वाद की इस अवधारणा ने मुस्लिम जोगियों को गोरखपंथ के नज़दीक कर दिया। इसीलिए मुस्लिम जोगी गोरखवाणी गाते रहे और जगह जगह घूमते रहे, गोरखपुर के पास के गांवों में मुस्लिम जोगियों की अच्छी खासी आबादी रही है।

जार्ज वेस्टन ब्रिग्स की पुस्तक ‘गोरखनाथ एंड दि कनफटा योगीज’ में दर्ज 1891 की जनसंख्या रिपोर्ट में दी गई पंजाब की जनसंख्या को सिर्फ आधार बनाएं तो कुल गोरखपंथियों में करीब 40% मुस्लिम जोगी थे। क्योंकि तब पंजाब में 28,816 गोरखनाथी, 78,387 योगी में 38,137 मुसलमान योगी थे।

इसलिए उत्तराखंड में आने वाले “जोगी” सिर्फ हिंदू संन्यासी नहीं थे, बल्कि कई मुस्लिम फ़कीर भी जोगी परंपरा से जुड़े थे जो गाँवों में भी एक अलग जाति या पेशेवर समुदाय के रूप में पहचाने जाते थे। इनका पेशा और ज़िंदगी अक्सर गीत-संगीत, साधना, जड़ी-बूटी उपचार, मंत्र फूंक दरूद (जैसा कि अभी भी मस्जिदों के बाहर लोग/महिलाएं खड़े रहते हैं ताकि नमाज़ पढ़कर मस्जिद से निकलते हुए नमाजी से उनपर और गोद के बच्चों पर फूंक कर दें) भविष्यवाणी, अच्छे बुरे की जानकारी, और मेलों में भागीदारी था।

एक अरसा बीतने पर सड़क मार्ग मोटर यातायात शुरू होने से पैदल यात्रा का पैटर्न उसी तरह बदल गया जैसे चार धाम की पैदल यात्रा खत्म/बहुत सीमित हो गई है। और चारधाम के पैदल रास्ते वीरान हो गए हैं।

एकेश्वरवाद की शिक्षा देने वाले सूफियों की आवाजाही जंगल के रास्ते में खत्म होने के बाद। जंगल के मुहानों और परम्परागत वन मार्ग में बनी हुई सूफियों और जोगियों की कब्रें मज़ारें समाधियां संरचनाएं उजाड़ हो गई और धीरे आस-पास की आबादी द्वारा परिवर्तित समाधि स्थल पूज्य स्थान बना दिए गए जिनमें परम्परागत रूप से सभी समुदाय शामिल रहे हैं।

इस तरह हिमालयी राज्यों में जगह जगह जो धार्मिक संरचनाएं मज़ार के रूप में बताई जाती हैं उनमे सूफ़ी फकीरों की कब्रों के अलावा गोरखपंथियों और कबीर पंथी संतों फकीरों की परिवर्तित समाधि स्थल भी हो सकते हैं। जो एक वक्त में धार्मिक सांस्कृतिक अन्तर्सम्बन्ध, सद्भाव, सह-अस्तित्व और लोक-शिक्षण के प्रतीक और स्थल थे।

लेखक, पत्रकार और शायर 72 वर्षीय गांधीवादी इस्लाम हुसैन का जन्म अपने ननिहाल रानीखेत में हुआ है, उनके दादा गोरखा रायफल्स के फौजी थे तो नाना कुमाऊं रेजीमेंट की सिविल सेवा थे। वो 1975 से लेखन के क्षेत्र में हैं। हिन्दी, उर्दू, अंग्रेजी के राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दैनिक साप्ताहिक समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में उनकी अनेक लेख, फीचर रिपोर्ट्स, कहानियां शायरी प्रकाशित हुई हैं, उनकी अनेक रिपोर्ट्स शोधकर्ताओं द्वारा अपने शोध में सम्मिलित की गई हैं, उनके सामाजिक कार्यों पर भी शोधकार्य हुए हैं और कुमाऊं विश्वविद्यालय के एक शोधकर्ता को पीएचडी मिल चुकी है। इस्लाम हुसैन मान्यता प्राप्त पत्रकार रहे हैं, उनकी चार किताबें छप चुकी है।