डॉक्टरों की कमी, जरूरी दवाओं का अभाव और बदहाल अस्पतालों ने बढ़ाई मरीजों की मुश्किलें
देहरादून। उत्तराखंड की स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है। हाल ही में सार्वजनिक हुई राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (एनएचएम) की 17वीं कॉमन रिव्यू मिशन रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि राज्य के अनेक सरकारी अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों, विशेषज्ञों, नर्सिंग स्टाफ और आवश्यक दवाओं की कमी बनी हुई है। इसका सबसे अधिक असर पर्वतीय और दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले लोगों पर पड़ रहा है।
रिपोर्ट के अनुसार, कई प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र और जिला अस्पताल निर्धारित मानकों के अनुरूप स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने में पीछे हैं। बड़ी संख्या में चिकित्सकों और विशेषज्ञों के पद खाली होने के कारण मरीजों को इलाज के लिए एक अस्पताल से दूसरे अस्पताल भेजना पड़ रहा है। कई पर्वतीय क्षेत्रों में आज भी स्वास्थ्य केंद्र रेफरल सेंटर बनकर रह गए हैं।
स्वास्थ्य संस्थानों में उपलब्ध दवाओं की स्थिति भी चिंताजनक बताई गई है। आवश्यक दवाओं की सूची के मुकाबले कई अस्पतालों में काफी कम दवाएं उपलब्ध मिलीं। मधुमेह और उच्च रक्तचाप जैसी बीमारियों के मरीजों को भी कई स्थानों पर पर्याप्त अवधि की दवा नहीं मिल पा रही, जिससे उपचार प्रभावित होने की आशंका है।
रिपोर्ट में दवा भंडारण और वितरण व्यवस्था में भी कमियां सामने आई हैं। कई जिलों में दवाओं के सुरक्षित भंडारण, परिवहन और आपूर्ति के लिए पर्याप्त संसाधनों का अभाव पाया गया। इससे समय पर दवाएं अस्पतालों तक पहुंचाने में कठिनाइयां सामने आ रही हैं। मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर भी कई चुनौतियां चिन्हित की गई हैं। दुर्गम क्षेत्रों में आज भी कुछ गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचाया जा पा रहा है, जिससे सुरक्षित प्रसव की व्यवस्था प्रभावित होती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत बनाने के लिए डॉक्टरों की नियमित भर्ती, दूरस्थ क्षेत्रों में सेवा के लिए प्रभावी नीति, दवा आपूर्ति प्रणाली में सुधार और अस्पतालों के बुनियादी ढांचे को सुदृढ़ करना आवश्यक है। जब तक इन चुनौतियों का समाधान नहीं होगा, तब तक आम लोगों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना कठिन बना रहेगा।
उत्तराखंड के अस्पतालों में डॉक्टर समेत संसाधनों की भारी कमी
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की 17वीं कॉमन रिव्यू मिशन की रिपोर्ट जनवरी 2025 से अक्टूबर 2025 के बीच हुए अध्ययन के आधार पर तैयार की गई है। रिपोर्ट में जिक्र किया गया है कि उत्तराखंड के प्राथमिक और माध्यमिक स्वास्थ्य केंद्रों में मानक के अनुसार मानव संसाधन की भारी कमी और संरचना का अपर्याप्त इस्तेमाल पाया गया है, जिससे स्वास्थ्य सेवा प्रभावित हो रही है।
डॉक्टर पहाड़ चढ़ने को तैयार नहीं
रिपोर्ट के अनुसार, प्रदेश के दूरदराज क्षेत्रों में काम करने की अनिच्छा के चलते डॉक्टर्स की कमी बनी हुई है। यानी डॉक्टर पहाड़ चढ़ने को राजी नहीं हैं, जिसके चलते पहाड़ी और दुर्गम इलाकों में डॉक्टरों की भारी कमी है। राज्य में सार्वजनिक स्वास्थ्य मानकों (इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड्स) के अनुरूप कई पद खाली हैं, जिससे सेवाओं की पहुंच और उसकी क्वालिटी प्रभावित हो रही है।
एचआरएच सेल में कार्यक्रम अधिकारी का पद खाली
वहीं, मानव संसाधन स्वास्थ्य सेल (एचआरएच सेल) का गठन किया गया है, लेकिन यहां कार्यक्रम अधिकारी का एक पद खाली है। कार्यस्थल सुरक्षा के लिए यौन उत्पीड़न निवारण समिति (प्रिवेंशन ऑफ सेक्सुअल हैरेसमेंट कमेटी) स्थापित की गई है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन पदों के लिए कार्य विवरण (टर्म्स ऑफ रेफरेंस) तैयार हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन कर्मचारियों को नियमित भर्ती को महत्व नहीं दिया जा रहा है।
एसएचसी, पीएचसी, सीएचसी समेत तमाम अस्पतालों की हालत खराब
राज्य में करीब 2,577 प्राथमिक व माध्यमिक स्वास्थ्य संस्थानों (सब हेल्थ सेंटर/प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र/समुदाय स्वास्थ्य केंद्र/उप-जिला व जिला अस्पताल) का 99 फीसदी आईपीएचएस (इंडियन पब्लिक हेल्थ स्टैंडर्ड्स) अनुपालन के लिए आकलन किया गया। ज्यादातर संस्थान निम्न स्कोर वाले यानी एस्पिरेंट श्रेणी में पाए गए हैं, जिनका स्कोर 25 से 50 फीसदी के बीच हैं, जिसकी मुख्य वजह खाली पदों की संख्या और प्रशिक्षित कर्मचारियों की सीमित उपलब्धता है।
अस्पतालों में दवाओं की भारी कमी
प्राथमिक स्तर के सब-हेल्थ सेंटर के लिए सूची में 74 दवाएं अंकित हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र के लिए 135 दवाएं और माध्यमिक देखभाल केंद्रों के लिए करीब 690 दवाएं शामिल हैं, लेकिन अस्पतालों में अधिसूचित आवश्यक दवा सूची से कम दवाओं की उपलब्धता पाई गई है। यानी दवाओं की भारी कमी है। कुछ सब-हेल्थ सेंटरों पर 40- 65 दवाएं उपलब्ध थीं।
जबकि, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 54-80 दवाएं उपलब्ध थी। इसी तरह माध्यमिक सुविधाओं में समुदाय स्वास्थ्य केंद्रों पर 76 दवाएं, उप-जिला अस्पतालों पर 93-132 दवाएं और जिला अस्पतालों पर 161-208 दवाएं उपलब्ध रहीं, जो उच्च स्तर की सुविधाओं पर भी जरूरी दवाइयों में कमी को बता रहा है।
उधम सिंह नगर जिले में एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं की कमी
वहीं, आपातकालीन दवा बजट का इस्तेमाल कैल्शियम, विटामिन-ए, आपसी-पारंपरिक गर्भनिरोधक गोलियां (ओरल कंट्रासेप्टिव पिल्स) और ग्लाइमपिराइड जैसी दवाइयों की खरीद के लिए किया जा रहा था। उधम सिंह नगर जिले में एंटी-रेट्रोवायरल दवाओं की कमी भी रिपोर्ट की गई।
बिना जरूरत के मरीजों से कराए जा रहे टेस्ट
कॉमन रिव्यू मिशन की इस रिपोर्ट के मुताबिक, ये भी देखा गया कि कुछ डॉक्टरों की ओर से बिना जरूरत के बायोकेमिस्ट्री परीक्षण (लिवर फंक्शन टेस्ट, किडनी फंक्शन टेस्ट और लिपिड प्रोफाइल) ओपीडी मरीजों की कराई जा रही है, ऐसे में प्रिस्क्रिप्शन ऑडिट की भी जरूरत है।
अभी तक लिंग अनुपात रिपोर्ट नहीं की गई तैयार
प्रदेश में प्रेग्नेंसी काउंसलिंग कानून (प्रेग्नेंसी कंट्रोल एंड प्रेग्नेंसी नेब्रिंग डेथ/पीसीपीएनडीटी) की राज्य पर्यवेक्षी समिति गठित है, जिसकी बैठक अगस्त 2025 में हुई थी, लेकिन जिलों, ब्लॉकों और गांवों का कम लिंग अनुपात रिपोर्ट तैयार नहीं किया गया है और ऑनलाइन पंजीकरण पोर्टल भी तैयार नहीं हुआ है।
गर्भावर्तियों से जुड़ी सेवाओं में काफी कमी
मातृ स्वास्थ्य सेवाएं (गर्भावस्था पूर्व और बाद देखभाल) ज्यादातर सुविधाओं में उपलब्ध हैं और सूचियां व ट्रैकिंग रखी जा रही हैं, लेकिन मैटरनल काइलेकर प्रपत्रों (मैटरनल एंड चाइल्ड हेल्थ प्रोफाइल कार्ड) और उच्च-जोखिम गर्भधारण रजिस्टरों में जानकारी पूरी नहीं रहतीं और कुछ जिलों में डिजिटल हीमोग्लोबिनोमीटर की अनुपलब्धता व कैल्शियम, विटामिन-ए इंजेक्शन की स्टॉक-आउट जैसी समस्याएं देखी गईं।
पहाड़ों में घर पर हो रहा प्रसव
दूरदराज क्षेत्रों में विषम भौगोलिक परिस्थितियों के चलते स्वास्थ्य सेवा प्रभावित हो रहा है, कुछ दूरस्थ क्षेत्रों में होम डिलीवरी रिपोर्ट हुई हैं। मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए पारंपरिक पालकी यानी डंडी कंडी आदि का इस्तेमाल किया जा रहा है, इतना ही नहीं आशा वर्कर्स में हाई रिस्क वाले गर्भधारण और प्रवस के बाद देखभाल को लेकर प्रोत्साहन एवं भुगतान संबंधी जानकारी कम थी।
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